NADIR HASNAIN


अमन परस्त हूँ मुख़लिस परिंदा रहने दो - Poem by NADIR HASNAIN

अमन परस्त हूँ मुख़लिस परिंदा रहने दो
भाईचारा मेरा अख़लाक़ ज़िंदा रहने दो
ज़मीन ए हिंद किसी एक की जागीर नहीं
धरती माँ की सभी औलाद ज़िंदा रहने दो

मुल्क में चारों तरफ फैली आहोज़ारी है
वतन के दिल पर सियासत का वार जारी है
माँ का आँचल उसी के खूं से भिगोने वालो
हमारे देश का उँचा तिरंगा रहने दो

दहशत में है अवाम ए हिंद मुश्किल में चमन है
जो बात करे हक़ की क्या ग़द्दार ए वतन है
आवाज़ दे रहा है वतन चींख चींख कर
गंगा ज्म्नी मेरी तहज़ीब ज़िंदा रहने दो

मस्जिद का है एमाम ना मंदिर का पुजारी
भूका है इक़तेदार का वहशी शिकारी
मक़सद में हो ना कामयाब देश द्रोही
नफ़रत की फेज़ा मुल्क में ना बहने दो

आलिम हो या फ़नकार या बेबाक सहाफी
रखने को हैं तैयार ना एजाज़ी ट्रोफी
नादिर है एहतेजाज ए वजह अदम तहममुल
हमारे देश की जम्हूरियत ना खोने दो
: नादिर हसनैन

Topic(s) of this poem: pray

Form: ABC


Comments about अमन परस्त हूँ मुख़लिस परिंदा रहने दो by NADIR HASNAIN

  • Rajnish Manga (11/15/2015 9:47:00 AM)


    मैं आपके विचारों का स्वागत व समर्थन करता हूँ. आपने इस देश की सांस्कृतिक विरासत को जीवित रखने की ज़रूरत को इस कविता में बखूबी अभिव्यक्ति दी है. बहुत सुंदर. निम्नलिखित पंक्तियाँ प्रभावशाली है:
    गंगा ज्म्नी मेरी तहज़ीब ज़िंदा रहने दो
    मक़सद में हो ना कामयाब देश द्रोही
    नफ़रत की फेज़ा मुल्क में ना बहने दो
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Poem Submitted: Sunday, November 15, 2015



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