Wednesday, September 23, 2015

जि‍द्दी परिंदा Comments

Rating: 5.0

मेरे दिल के किसी कोने में कहीं जो एक जिद्दी परिंदा है

उम्मीदों से है घायल, और अपनी ही उम्मीद से जिंदा है
 
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Shiv Chandra
COMMENTS
Rajnish Manga 23 September 2015

कवि हृदय में उठने वाले मनोभावों को, उसकी आशा, निराशा, अपनी सहज प्राप्तियों व विसंगतियों को इस कविता में बहुत खूबसूरती से उकेरा गया है. रचना बहुत रोचक है जिसमे जीवन का स्पंदन है. धन्यवाद, शिव चन्द्र जी. एक बानगी: उम्मीदों से है घायल, और अपनी ही उम्मीद से जिंदा है.../ अपनी वर्जनाओं में जीता, दिल की बस्ती का बाशिंदा है

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Anita Sharma 23 September 2015

good emotive write.liked

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M Asim Nehal 23 September 2015

बहुत बढ़िया , बहुत बढ़िया ! ! ! ! ! ! ! ! !

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