Shiv Chandra

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Best Poem of Shiv Chandra

जि‍द्दी परिंदा

मेरे दिल के किसी कोने में कहीं जो एक जिद्दी परिंदा है

उम्मीदों से है घायल, और अपनी ही उम्मीद से जिंदा है
 

रिश्तों की जमापूंजी की, मधुर मिठास को फिर संभालता

अपनी वर्जनाओं में जीता, दिल की बस्ती का बाशिंदा  है

कहानियां किस्मत ने खूब रची थी, कल तेरे मेरे रिश्तों की

मै बावरी-सी क्यूं, सुध-बुध खोती, नाव चलाती थी रिश्तों की




 

जमीं पे आकर सच को देखा, तो बारात लगी थी रिश्तों की

बंटवारे की किश्तों से चुकता कर, मैने नींव रखी थी रिश्तों की

मेरी इस मि‍ल्कियत को सहेजे, दिल का ये जो जिद्दी परिंदा है

फिर उम्मीदों से है ...

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