Sushil Swamy


प्रतिस्पर्धा - Poem by Sushil Swamy

शीर्ष संकुचित भीड़ भारी
सफलता के अथक् प्रयास है जारी
भर भी है कद भी ऊँचे
शीर्ष से फिर भी अछूते
प्रतियोगी लड़ पड़े हैं
शीर्ष संकुचित भीड़ भारी
सफलता के अथक् प्रयास है जारी

जीन धरा ने इनको सींचे
वो पड़ी है तिरस्कृत नीचे
अंकुरें अब वृक्ष बनी है
शिरा धमनि सब तनी है
शीर्ष संकुचित भीड़ भारी
सफलता के अथक् प्रयास है जारी

शाख इनके सघन तंतु
मूल इनके पंक परन्तु
सिर्शरहित हर्ष खड़ी है
अल्पज्ञान महामारी बनी है
शीर्ष संकुचित भीड़ भारी
सफलता के अथक् प्रयास है जारी

- सुशील स्वामी

Topic(s) of this poem: ego , fighting


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Poem Submitted: Monday, November 2, 2015



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