Dinesh Kumar Gupta

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एक पुराना खत मिला कागज के ढेर में - Poem by Dinesh Kumar Gupta

आज अनयास ही किताबों के उलट फेर में
एक पुराना खत मिला कागज के ढेर में

फिर उसने कुरेद दीं कुछ पुरानी बातें
जो दफन थी यादें वक़्त के तह फेर में

आज चलूँ एक बार फिर उसी मोड़ पर
जहां करते थे इंतेजार तुम शाम-सबेर में

चाँद लेकर आई है चाँदनी मेरे आँगन में
रोशनी नही फैली बस मेरे मन अंधेर में

जो रहता है ऐतबार अब भी उसके वादों का
कब तक मैं बंधी रहूंगी इस उम्मीदें डोर में....

Topic(s) of this poem: love


Comments about एक पुराना खत मिला कागज के ढेर में by Dinesh Kumar Gupta

  • Akham Nilabirdhwaja Singh (11/5/2015 8:52:00 AM)


    Lovely.Nicely written. (Report) Reply

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    0 person did not like.
  • Rajnish Manga (11/5/2015 8:19:00 AM)


    आपका यह आरंभिक प्रयास प्रशंसनीय है, मित्र. धन्यवाद व शुभकामनायें. (Report) Reply

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Poem Submitted: Thursday, November 5, 2015

Poem Edited: Thursday, November 5, 2015


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