Samar Sudha


अंधेरो में उजाला - Poem by Samar Sudha

'अंधेरो रास्तो में कहीं खो गया हूँ
जगते जगते, कहीं सो गया हूँ'

'भटका है मन, यूँ क्यों मुझसे
दीये उजालो के, गए क्यों भुज से'

'रौशनी नहीं, बस छाईए काली घटा
रे ऐह सूरए, अपना शौर्य दिखा'

'छुड़ा कैद से, पंछी ख़्यालो के
ढूंढ़ जवाब, कुछ ऐसे सवालो के'

'शायद जवाबो से मिले, हल वो सारे
बहते हो दूर, जो दरिया किनारे'

'कश्ती भी ना पहुंचे जहा
समझ में ऐसा जरिया बना'

'के मिले वो किरण और हो ऐसा सवेरा
की सूरज के छुपने से ना हो अँधेरा'

समर सुधा

Topic(s) of this poem: darkness


Comments about अंधेरो में उजाला by Samar Sudha

  • Abhilasha Bhatt (1/12/2016 6:04:00 AM)


    Beautiful poem...thanks for sharing :) (Report) Reply

    0 person liked.
    0 person did not like.
Read all 1 comments »



Read this poem in other languages

This poem has not been translated into any other language yet.

I would like to translate this poem »

word flags


Poem Submitted: Tuesday, January 12, 2016



[Report Error]