Priya Guru


ये सब बहाने है - Poem by Priya Guru

आज-आज मैं मैं कल-कल तू तू
ये सब तोह बहाने है

उसकी आँखे, इसका इश्क़
ये भी सब बहाने है

ये नाराज़गी बहाना है तो ये बेचैनी भी बहाना है
ये कविता बहाना है तो ये फ़ोन भी बहाना है

ये आसमां बहाना है और ये जमीं भी बहाना है
तू भी है एक बहाना यहां और मैं भी हूँ एक बहाना

हक़ीक़त बस इतनी है की कुछ हक़ीक़त नहीं यहां
सच बस इतना है की कुछ सच नहीं यहां

अगर कुछ है तो कहीं और नहीं बस यहीं है, अभी में है
मुझमे है थोड़ा तोह तुझमे भी है

Topic(s) of this poem: healing, introspection, love


Comments about ये सब बहाने है by Priya Guru

There is no comment submitted by members..



Read this poem in other languages

This poem has not been translated into any other language yet.

I would like to translate this poem »

word flags


Poem Submitted: Wednesday, January 13, 2016



[Report Error]