Priya Guru


मंजिल बिछड़े ज़माने से - Poem by Priya Guru

ढूंढ रहा था मंजिल बिछड़े ज़माने से
बंदी है ये दिल हासिल नही कारवा आजमाने से
बैठी है कब से तू इंतज़ार में उसके
छोड़ दी वो बस्ती कबसे ना जाने दूंगा इस बार बहाने से

Topic(s) of this poem: love and art


Comments about मंजिल बिछड़े ज़माने से by Priya Guru

  • Rajnish Manga (1/12/2016 5:55:00 AM)


    आकर्षक व रोचक मुक्तक. आपकी कविता में भावों की अच्छी तस्वीर नज़र आती है. (Report) Reply

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Poem Submitted: Tuesday, January 12, 2016



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