केसरिया ये रंग पिया मोहे बहुत है भाए..! !
नटखट मोरे जब तो माखन खाये,
मां जसोदा का लाड़ला बाबा नन्द का दुलारा
मां देवकी की आन्खों का तारा
पिता वसुदेव का प्यारा सब्को भाए,
तुझ बिन मोहे कुछ नाहि भाये,
तोहि प्रेम बन्सुरि जब सुनु तो
बन्धन लाज शरम छोड सबे छुटै..
बलम बलम कहती फ़िरुं
मोहन मोहन मै पुकारुं,
अभी यहां थे अभी कहीं हो,
कभी धरा पे कभी गगन मे॓ं
तुम हो काल गति से परे ओ मोहन,
दिल आत्मा सब तुमको ही चाहे
तो सदा ही सुहागन कहलाउं,
कृश्ण कन्हाइ तेरे सङग
कभी राधा तो कभी मीराबाई कहलायुं
इक पाति सांबरे तोहे लिखुं बड़े निर्मोही हो
कभी तो मिलन को आओ
नैन तरसते तो कभी बरसते
तेरा रसता सदा निहारूं
युग युग से तेरि दासी हूं
तो देव की दासी देवदासी
कृषणदासी कहलाउं...! !
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