केसरिया ये रंग पिया मोहे बहुत है भाए Poem by Anita Sharma

केसरिया ये रंग पिया मोहे बहुत है भाए

केसरिया ये रंग पिया मोहे बहुत है भाए..! !
नटखट मोरे जब तो माखन खाये,
मां जसोदा का लाड़ला बाबा नन्द का दुलारा
मां देवकी की आन्खों का तारा
पिता वसुदेव का प्यारा सब्को भाए,
तुझ बिन मोहे कुछ नाहि भाये,
तोहि प्रेम बन्सुरि जब सुनु तो
बन्धन लाज शरम छोड सबे छुटै..
बलम बलम कहती फ़िरुं
मोहन मोहन मै पुकारुं,
अभी यहां थे अभी कहीं हो,
कभी धरा पे कभी गगन मे॓ं
तुम हो काल गति से परे ओ मोहन,
दिल आत्मा सब तुमको ही चाहे
तो सदा ही सुहागन कहलाउं,
कृश्ण कन्हाइ तेरे सङग
कभी राधा तो कभी मीराबाई कहलायुं
इक पाति सांबरे तोहे लिखुं बड़े निर्मोही हो
कभी तो मिलन को आओ
नैन तरसते तो कभी बरसते
तेरा रसता सदा निहारूं
युग युग से तेरि दासी हूं
तो देव की दासी देवदासी
कृषणदासी कहलाउं...! !

केसरिया ये रंग पिया मोहे बहुत है भाए
POET'S NOTES ABOUT THE POEM
Krishna is utterly incomparable, he is so unique. Firstly, his uniqueness lies in the fact that although Krishna happened in the ancient past he belongs to the future, is really of the future.love and devotion towards krishna is the path of libration
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