Shashikant Nishant Sharma

Rookie - 133 Points (03 September,1988 / Sonepur, Saran, Bihar, India)

हम थे बन्दर हम है बन्दर - Poem by Shashikant Nishant Sharma

कौन कहता हैं
हम आदि मानव थे
बड़े बेदंगे और असभ्य
एकदम से असंस्कृत
और आज बन गए है मानव
सहृदय, सामाजिक उर सभ्य
सर्व गुण संपन्न और सुसंस्कृत
नहीं ऐसा नहीं है
तो क्या सही हैं?
हमारे पूर्वज थे बन्दर
रहते थे थोड़ा बिगड़कर
थोड़ा सा संवरकर
हम आज भी है बन्दर
पर थोड़ा सा भिन्न
नैतिकता से बिपन्न
ज्यादा साधन संपन्न
स्वार्थ और इर्ष्या
अपना अंग हैं अभिन्न
देखकर दूसरों की उन्नति
रहते सदा खिन्न
आज का मानव मानव नहीं
दानव से बढकर है
अश्त्र- शस्त्र से लैश
शक्तिशाली बन्दर है
विध्वंश और विनाश का
जीता जगता पुतला है
बदला और साम्राज्यवाद
कूट कूट के भरा है
करने को एक दुसरें को बर्बाद
रचते है षड्यंत्र अनेक
लेकर हाथ में बम
ताने एक दुसरे पे बन्दुक
मरने मारने को तैयार है हम
शस्त्र दिखा कर कहते हैं
निशस्त्र रहो
एटम बामन बनके कहते है
बमबारी मत करो
आतंक फैलाकर कहते है
आतंकवाद बंद करो
लेकर नाम लोकतंत्र का
फैला रहे है जाल शोषण तंत्र का
भूल गए है हम जियो और जीने दो
लेकर हरी का नाम
करते है कुछ ऐसा काम
शिखा है हमने नए युग का
इस महा प्रतापी कलयुग का
नया मूल मंत्र
'मरो और मर जाओ'
कुछ नहीं तो कम से कम
सब बर्बाद कर जाओ
बारूद के टीले पे
हम खरे होकर
कर रहे है तैयार
मल्य युद्ध का नहीं
महा युद्ध का
जो कर देगा सब सुद्ध
अग्नि में जलाकर
महाप्रलय लाकर
हम मानव नहीं
शक्तिशाली बन्दर
आँखों में है प्रलय का मंजर
हाथ में है महाघाती खंजर
हम थे बन्दर हम है बन्दर
पहले धरा में कूद फांदते थे
उसी पे खेलते थे
कहता है साहिल
नए युग का बन्दर है जाहिल
टिका हमारे हाथों में
आज पृथ्वी बनकर नारियल
भाग्य हमारा धरा पे नहीं है अड़ा
धरा का भाग्य है हमारे हाथ में अड़ा
शशिकांत निशांत शर्मा 'साहिल'
कौन कहता हैं
हम आदि मानव थे
बड़े बेदंगे और असभ्य
एकदम से असंस्कृत
और आज बन गए है मानव
सहृदय, सामाजिक उर सभ्य
सर्व गुण संपन्न और सुसंस्कृत
नहीं ऐसा नहीं है
तो क्या सही हैं?
हमारे पूर्वज थे बन्दर
रहते थे थोड़ा बिगड़कर
थोड़ा सा संवरकर
हम आज भी है बन्दर
पर थोड़ा सा भिन्न
नैतिकता से बिपन्न
ज्यादा साधन संपन्न
स्वार्थ और इर्ष्या
अपना अंग हैं अभिन्न
देखकर दूसरों की उन्नति
रहते सदा खिन्न
आज का मानव मानव नहीं
दानव से बढकर है
अश्त्र- शस्त्र से लैश
शक्तिशाली बन्दर है
विध्वंश और विनाश का
जीता जगता पुतला है
बदला और साम्राज्यवाद
कूट कूट के भरा है
करने को एक दुसरें को बर्बाद
रचते है षड्यंत्र अनेक
लेकर हाथ में बम
ताने एक दुसरे पे बन्दुक
मरने मारने को तैयार है हम
शस्त्र दिखा कर कहते हैं
निशस्त्र रहो
एटम बामन बनके कहते है
बमबारी मत करो
आतंक फैलाकर कहते है
आतंकवाद बंद करो
लेकर नाम लोकतंत्र का
फैला रहे है जाल शोषण तंत्र का
भूल गए है हम जियो और जीने दो
लेकर हरी का नाम
करते है कुछ ऐसा काम
शिखा है हमने नए युग का
इस महा प्रतापी कलयुग का
नया मूल मंत्र
'मरो और मर जाओ'
कुछ नहीं तो कम से कम
सब बर्बाद कर जाओ
बारूद के टीले पे
हम खरे होकर
कर रहे है तैयार
मल्य युद्ध का नहीं
महा युद्ध का
जो कर देगा सब सुद्ध
अग्नि में जलाकर
महाप्रलय लाकर
हम मानव नहीं
शक्तिशाली बन्दर
आँखों में है प्रलय का मंजर
हाथ में है महाघाती खंजर
हम थे बन्दर हम है बन्दर
पहले धरा में कूद फांदते थे
उसी पे खेलते थे
कहता है साहिल
नए युग का बन्दर है जाहिल
टिका हमारे हाथों में
आज पृथ्वी बनकर नारियल
भाग्य हमारा धरा पे नहीं है अड़ा
धरा का भाग्य है हमारे हाथ में अड़ा
शशिकांत निशांत शर्मा 'साहिल'


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Poem Submitted: Tuesday, January 29, 2013



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