शांत सुबह में लाली सूरज की
जिसमे रम रम जाऊं मैं
नीरव शांति के आँगन में कान्हा तुझ दर्शन को आवु मैं
एक अगाध सागर मन का पास तुम्हारे लाऊं मैं
नीरवता के उस मंडप में पूजा पुष्प चढाऊं मैं
तुझ सम बतियावू मन की बातें हिर्दय शोर
तुझे सुनावु मैं,
मन की अगन बताकर तुझको असीम शांति पाऊं मैं
मूरत देख देख कर तेरी बावरी तो हो जावू मैं
मनभावन मुस्कान पे तेरी कान्हा, वारि वारि जावू मैं
कह न सकू शब्दों में कैसी छबि तेरी है किसे बताऊँ मैं
खोकर दर्शन में तेरे, खुद को धन्य बनावु मैं
आश एक अब यही है तुझसे कान्हा
हर दिन दर्श को तेरे आवु मैं........
रखना शरण में अपनी हरदम
शीशझुका के मांगू इतना मैं
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अपने आराध्य देव के चरणों में एक निर्मल प्रार्थना एवम् प्रभु से भक्त का निस्वार्थ संवाद. बहुत सुंदर कविता. हार्दिक धन्यवाद, बहन पुष्पा जी.
meri harek kavita ko aapne dil se saraha hai bhai behad khushi hui bahut bahut dhanywad bhaai mera utsah badhane ke liye.