मैं अक्सर चुप ही रहती हूँ
शब्दों के परों पर उड़ती सी रहती हूँ
सुनकर हर बात बस तोलती रहती हूँ
मैं अक्सर चुप ही रहती हूँ
हर पल दिल पर रखे बोझ को सहती हूँ
सबकी सुनकर भी अपनी नहीं कहती हूँ
शब्दो के दरिया मे लहर बन बहती हूँ
मैं अक्सर चुप ही रहती हूँ
खमोशी मे गूंज बनकर गूंजती हूँ
आसमान मे तरंग बनकर तैरती हूँ
कभी कभार इस बोझ को उतार कर फेकती हूँ
मैं अक्सर चुप ही रहती हूँ
इस माटी से बेबस शब्दों को रचती हूँ
उनमें जान फूँकने की नाकाम कोशिश करती हूँ
फिर उनके बिछाये जाल मे आप ही फंसती हूँ
मैं अक्सर चुप ही रहती हूँ
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यह एक विडंबना ही है कि हम मनमाफ़िक माहौल न मिलने के कारण या उचित प्रेरणा या प्रोत्साहन न मिलने के कारण अपनी जुबान को ताला लगा लेते हैं. कभी कभी इसका परिणाम यह होता है कि हमारी क्रियात्मक सोच कुंठित हो जाती है. आपने इसे बहुत खूबसूरती से व्यक्त किया है. Thanks. मैं अक्सर चुप ही रहती हूँ इस माटी से बेबस शब्दों को रचती हूँ उनमें जान फूँकने की नाकाम कोशिश करती हूँ
कविता पसंद करने के लिए धन्यवाद श्रीमान