विधाता की विधा को
हर कोई जानता है
ऊपर से फेंककर
वो यही जांचता है
टूटकर बिखर गया
खिलोना वो कच्चा है
गिरकर भी सम्भल गया
हीरा वो सच्चा है
विधाता की दया को
सब कोई मानता है
नेमत से अपनी वो
उन्ही को सँवारता है
पराई पीड़ा को भी जो
अपना सा मानता है
सुख दुख दोनों में
गुण उसी के बांचता है
विधाता की विधा को
हर कोई जानता है
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Beautiful poem. Interesting to read, something to know. Thanks for sharing.