विधाता की विधा Poem by Kezia Kezia

विधाता की विधा

विधाता की विधा को

हर कोई जानता है

ऊपर से फेंककर

वो यही जांचता है

टूटकर बिखर गया

खिलोना वो कच्चा है

गिरकर भी सम्भल गया

हीरा वो सच्चा है

विधाता की दया को

सब कोई मानता है

नेमत से अपनी वो

उन्ही को सँवारता है

पराई पीड़ा को भी जो

अपना सा मानता है

सुख दुख दोनों में

गुण उसी के बांचता है

विधाता की विधा को

हर कोई जानता है

*****

Friday, March 31, 2017
Topic(s) of this poem: god
COMMENTS OF THE POEM
Kumarmani Mahakul 31 March 2017

Beautiful poem. Interesting to read, something to know. Thanks for sharing.

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