मैं जीना नही चाहता था
लेकिन मानव प्रकृति ने
मुझे विवश किया
मैं घोर विपत्ति मे आशाओं को
बहती गंगा मे तारने की सोचता था
उनसे जीत पाना सम्भव नही लगता था
क्रोध के हर क्षण मे मृत्यु का
वरण सुखगामी लगता था
मुझे जीना आता ही नही था
अब जीना सीख गया हूँ
बहती नदी मे हाथ धोना सीख गया हूँ
अपने बोझ को दूसरों के
सिरों पर ढोना सीख गया हूँ
अपने कफन मे किसी और को
लपेटना सीख गया हूँ
अपनी टूटी नाव मे पेबंध
लगाना सीख गया
अपनी आरी से औरो की
डाली क़तरना सीख गया हूँ
बुझी हुई राख में भी
चिंगारी देना सीख गया हूँ
अब जब जीना सीख चुका हूँ
तो कभी मरना नही चाहता
इस जिजीविषा का अंत,
करना नही चाहता
इसे खो कर कभी
मरना नही चाहता
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