जिजीविषा Poem by Kezia Kezia

जिजीविषा

मैं जीना नही चाहता था

लेकिन मानव प्रकृति ने

मुझे विवश किया

मैं घोर विपत्ति मे आशाओं को

बहती गंगा मे तारने की सोचता था

उनसे जीत पाना सम्भव नही लगता था

क्रोध के हर क्षण मे मृत्यु का

वरण सुखगामी लगता था

मुझे जीना आता ही नही था

अब जीना सीख गया हूँ

बहती नदी मे हाथ धोना सीख गया हूँ

अपने बोझ को दूसरों के

सिरों पर ढोना सीख गया हूँ

अपने कफन मे किसी और को

लपेटना सीख गया हूँ

अपनी टूटी नाव मे पेबंध

लगाना सीख गया

अपनी आरी से औरो की

डाली क़तरना सीख गया हूँ

बुझी हुई राख में भी

चिंगारी देना सीख गया हूँ

अब जब जीना सीख चुका हूँ

तो कभी मरना नही चाहता

इस जिजीविषा का अंत,

करना नही चाहता

इसे खो कर कभी

मरना नही चाहता

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Friday, March 31, 2017
Topic(s) of this poem: philosophical
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