अपने हिस्से का आसमान Poem by Kezia Kezia

अपने हिस्से का आसमान

Rating: 5.0

'अपने अपने हिस्से का आसमान हर कोई चाहता है

कुछ खास तरीके से उसे सजाता है

आये दिन के मुश्किलों से उसे बचाता है

अपने हिस्से के आसमान को हर ओर से निहारता है

उस आसमान की तारीफ में खुदा से भी भीड़ जाता है

अपने आसमान को अपने अपने रंगों से रंगता है

खुद को मार कर कई बार आसमान को जिन्दा रखना चाहता है

अपने हिस्से के आसमान पर सब कुछ न्यौछावर कर देता है

काले बादलों की परछाईयों से उसे बचाता है

अपने अपने हिस्से का आसमान बहुत सुहावना होता है

आसमान को बचाने के लिए खुद को खपा देता है

फिर एक दिन सौप जाता किसी और को

उस आसमान को जिसे तन मन से संवारा था

जान देकर बचाया था, किसी और को देकर जिसे बढ़ जाना है

फिर किसी और आसमान का छोर थामना है

अपने आसमान के मोह से हर बार खुद को उबार लाना है

उस आसमान के तारों को चुन चुन कर

एक दिन औरों का आशियाना सजाना होता है

किसी के लिए सपना तो किसी के लिए अपना भी होता है

अपने अपने हिस्से का आसमान बहुत सुहावना होता है'

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Monday, April 3, 2017
Topic(s) of this poem: philosophical
COMMENTS OF THE POEM
Rajnish Manga 18 August 2020

अत्यंत सुन्दर कविता. आपने सही कहा कि व्यक्ति जीवन भर अपने लिए एक ऐसी जगह ढूंढता है जो उसके सपनों का मूर्तरूप हो. इस जगह को आसमान भी कह सकते हैं. अपने हिस्से का आसमान. धन्यवाद.

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