कुछ ढूंढने आता हूँ Poem by Kezia Kezia

कुछ ढूंढने आता हूँ

कुछ ढूंढने जब घोसले से बाहर आता हूँ

देख कर बाहर का तमाशा खो जाता हूँ

इतने सवालों में घिर जाता हूँ

अजनबी भूलभुलैया में फंस कर रह जाता हूँ

सिर पर टूटे आसमान के टुकड़े को ताड़ता हूँ

पाँव के नीचे जमीन तलाशता हूँ

भागे हुए घोड़ो को पुकारता हूँ

चाकरी में जान गवांता हूँ

कुछ ढूंढने जब घोसले से बाहर आता हूँ

कुछ ढूंढने की एवज में सब कुछ भूल जाता हूँ

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Tuesday, April 4, 2017
Topic(s) of this poem: philosophical
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