हसरतों के धागे Poem by Kezia Kezia

हसरतों के धागे

हसरतों के ये फैले धागे

निकलना है सबको इनसे आगे

कैसी कैसी ये हसरतें

होते है दिल में कितने मनसूबे

दिल को दरिया और आँखों को झरना बनाते हैं

ये हसरतों के धागे हर कोई बांटना चाहते हैं

मुकाम पा जाए फिर भी

नए रास्ते तय किया करते हैं

हसरतों के घरोंदों में

हर रोज़ रोशनी किया करते हैं

ये धागे जुड़ाव के ये धागे अलगाव के

ये बाँधते हैं सबको अपनी अपनी डोर में

हसरतों के धागे निकलना है इनसे आगे

आफ़ताब की रौशनी भी कम इन धागों को

रोशन करने के लिए

तब आँखों से नूर लिया करते हैं

हसरतों के ये धागे तब और रोशन हो जाया करते हैं

सभी को अपनी गिरफ्त में समेटे जाते हैं

कोई तोड़ दे ये सारे धागे तो वक़्त भी ठहर जाएगा उसके आगे

ये हसरतों के धागे निकलना है सबको इनसे आगे

जमीनी हकीक़त से कोसों भागे

हसरतों के ये फैले धागे

Thursday, April 6, 2017
Topic(s) of this poem: philosophical
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