चलते चलते यही समझता रहा
आफताब की चाहत में चिराग गुज़र रहे है
फुर्सत की चाहत मे शामें गुज़र रही हैं
अपने आसमान की चाहत मे दिन गुज़र रहे हैं
कल की चाहत मे आज गुज़र रहे हैं
आज की चाहत में ताज गुज़र रहे हैं
सुकून की चाहत में साल गुज़र रहे हैं
मंजिलो की तलाश में रास्ते गुज़र रहे हैं
हमस़फर की तलाश में काफिले गुज़र रहे हैं
जवाबों की चाहतों मे सवाल उभर रहे हैं
बूंदो की चाहत मे अकाल गुज़र रहे हैं
मुकाम की चाहत में डेरे गुज़र रहे हैं
चलते चलते यही समझता रहा
वक़्त बड़ी तेज़ी से गुज़र रहा है
आज जब रुक कर देखा तो जाना इन तलाशो मे
उम्र सबसे तेज़ी से गुज़र रही है
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