यही समझता रहा Poem by Kezia Kezia

यही समझता रहा

चलते चलते यही समझता रहा

आफताब की चाहत में चिराग गुज़र रहे है

फुर्सत की चाहत मे शामें गुज़र रही हैं

अपने आसमान की चाहत मे दिन गुज़र रहे हैं

कल की चाहत मे आज गुज़र रहे हैं

आज की चाहत में ताज गुज़र रहे हैं

सुकून की चाहत में साल गुज़र रहे हैं

मंजिलो की तलाश में रास्ते गुज़र रहे हैं

हमस़फर की तलाश में काफिले गुज़र रहे हैं

जवाबों की चाहतों मे सवाल उभर रहे हैं

बूंदो की चाहत मे अकाल गुज़र रहे हैं

मुकाम की चाहत में डेरे गुज़र रहे हैं

चलते चलते यही समझता रहा

वक़्त बड़ी तेज़ी से गुज़र रहा है

आज जब रुक कर देखा तो जाना इन तलाशो मे

उम्र सबसे तेज़ी से गुज़र रही है

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Sunday, April 9, 2017
Topic(s) of this poem: philosophical
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