वो लिसलिसा एहसास Poem by Kezia Kezia

वो लिसलिसा एहसास

वो लिसलिसा एहसास

आज फिर एक बार ढूँढता हूँ

वो लिसलिसा एहसास

जो मेरी इंद्रियों को सम्भाले था

जो नौ महिने मेरा आवरण था

जो धूप छांव से मुझे बचाता था

जो हर घड़ी नई जान फूंकता था

अपने लहू से परवरिश करता था

जो भूख प्यास में मुझे सिझाता था

वो लिसलिसा सा अह्सास

आज फिर एक बार खोजता हूँ

बहुत अकेला हूँ बहुत थका हूँ

माँ एक बार फिर

अपनी कोख मे मुझे पनाह दे

उस अह्साह को फिर से जगा दे

वो बेइंतिहा सुकून के पल

फिर से एक बार दोहरा दे

दुनिया की इस जहरीली आबो हवा से

मुझे बचा ले

इस सजा से मुझे बुला ले

माँ वो लिसलिसा सा भाव

फिर से एक बार थमा दे

मैं सो नही पाता

इस आतंक के महौल मे

जिस दिन से तुने मुझे त्याग दिया

माँ एक बार फिर से,

अपनी कोख मे पनाह दे

मुझे इस दुनिया की बेरुखी से बचा ले

वो लिसलिसा अह्सास

एक बार फिर से थमा दे

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Sunday, April 9, 2017
Topic(s) of this poem: mother
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