हसरतें मिट रही हैं Poem by Kezia Kezia

हसरतें मिट रही हैं

नक़ाब लगाकर हकीकत को छुपाना

क्या सिर्फ तुम्हे आता है

ये वो गुर है जिसके लिए

जमाने में हमें पहचाना जाता है

***

डोल गए हैं किनारे

तक़दीर की कश्ती पर हिंडोले खाते खाते

आँखे पत्थर हो गयी हैं

ख़्वाबों को बसाते बसाते

*****

दरिया सी बहती थी

ये जिंदगी

जब मैं नासमझ था

संजीदगी और होशियारी ने

परों को क़तर कर अपाहिज बना दिया

****

काफिले बढ़ रहे है

अपनी अपनी चाहतों में

हसरतें मिट रही हैं

बेगानी फानी गफलतों में

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Thursday, April 13, 2017
Topic(s) of this poem: philosophical
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