नक़ाब लगाकर हकीकत को छुपाना
क्या सिर्फ तुम्हे आता है
ये वो गुर है जिसके लिए
जमाने में हमें पहचाना जाता है
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डोल गए हैं किनारे
तक़दीर की कश्ती पर हिंडोले खाते खाते
आँखे पत्थर हो गयी हैं
ख़्वाबों को बसाते बसाते
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दरिया सी बहती थी
ये जिंदगी
जब मैं नासमझ था
संजीदगी और होशियारी ने
परों को क़तर कर अपाहिज बना दिया
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काफिले बढ़ रहे है
अपनी अपनी चाहतों में
हसरतें मिट रही हैं
बेगानी फानी गफलतों में
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