पत्थरों से बहकर एक धारा
चीरती शिला का कलेजा
कलकल करती बहती आई
जीवन के राग सुनाती आई
विपत्तियों को भी मुस्कुरा कर सह्लाया
सभी रास्तों को कदमों मे झुकाया
जो मिला राह मे संग लिया
जो परे हटा वो छोड़ दिया
ना बैर ना किसी से अनुराग
सब करती पवित्र जल की अनुझरा
समतल मैदान में भी चली
पर्बतो में पली बढ़ी
खेत खलिहानो में हरे मैदानों में
बंजर गाँवों में
देखी हर डगर डगर
चारों तरफ के सम्मोहन को
पार कर आगे बढ़ी
जीवन दायिनी बन कर
घूमी बस्ती बस्ती लहर लहर
थक कर जब गिर गयी
सागर के तल में समा गई
पत्थरों से निकली धारा
संचित कर लिया सागर में जीवन सारा
******
This poem has not been translated into any other language yet.
I would like to translate this poem