पत्थरों से बहकर चली एक धारा Poem by Kezia Kezia

पत्थरों से बहकर चली एक धारा

पत्थरों से बहकर एक धारा

चीरती शिला का कलेजा

कलकल करती बहती आई

जीवन के राग सुनाती आई

विपत्तियों को भी मुस्कुरा कर सह्लाया

सभी रास्तों को कदमों मे झुकाया

जो मिला राह मे संग लिया

जो परे हटा वो छोड़ दिया

ना बैर ना किसी से अनुराग

सब करती पवित्र जल की अनुझरा

समतल मैदान में भी चली

पर्बतो में पली बढ़ी

खेत खलिहानो में हरे मैदानों में

बंजर गाँवों में

देखी हर डगर डगर

चारों तरफ के सम्मोहन को

पार कर आगे बढ़ी

जीवन दायिनी बन कर

घूमी बस्ती बस्ती लहर लहर

थक कर जब गिर गयी

सागर के तल में समा गई

पत्थरों से निकली धारा

संचित कर लिया सागर में जीवन सारा

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Saturday, April 15, 2017
Topic(s) of this poem: nature
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