जब कभी लिखते लिखते
शब्दों के तले दब जाऊँ
चारों ओर शब्द ऊँची मेड बनाकर
मुझे दुनिया से अलग कर दें
जब कभी शब्दों के गहरे बहाव मे
गोता लगाते लगाते डूब जाऊँ
इन शब्दों के आगे अपना पार ना पाऊँ
जब कभी इन शब्दों के परों पर
उड़ते उड़ते अपनी हद से बाहर
निकलकर गुम हो जाऊँ
खुद को कहीं भी देख ना पाऊँ
जब कभी इन शब्दों के बुने जाल में
फँसकर निकलने में नाकाम पाऊँ
निकलने की मश्शकत मे
और जकड़ता जाऊँ
जब कभी इन शब्दों की चादर ओढकर
थककर गहरी नींद मे सो जाऊँ
चाह कर भी जाग ना पाऊँ
तो मेरी इतनी सी गुजारिश है
मुझे मत बेदखल करना
इन शब्दों की जागीर से
इनके साथ ही दफना देना
क्योंकि जितना साथ इन
अल्हड़ शब्दों ने निभाया है
दूजा कोई क्या निभा पाता
******
This poem has not been translated into any other language yet.
I would like to translate this poem