शब्दों की जागीर Poem by Kezia Kezia

शब्दों की जागीर

जब कभी लिखते लिखते

शब्दों के तले दब जाऊँ

चारों ओर शब्द ऊँची मेड बनाकर

मुझे दुनिया से अलग कर दें

जब कभी शब्दों के गहरे बहाव मे

गोता लगाते लगाते डूब जाऊँ

इन शब्दों के आगे अपना पार ना पाऊँ

जब कभी इन शब्दों के परों पर

उड़ते उड़ते अपनी हद से बाहर

निकलकर गुम हो जाऊँ

खुद को कहीं भी देख ना पाऊँ

जब कभी इन शब्दों के बुने जाल में

फँसकर निकलने में नाकाम पाऊँ

निकलने की मश्शकत मे

और जकड़ता जाऊँ

जब कभी इन शब्दों की चादर ओढकर

थककर गहरी नींद मे सो जाऊँ

चाह कर भी जाग ना पाऊँ

तो मेरी इतनी सी गुजारिश है

मुझे मत बेदखल करना

इन शब्दों की जागीर से

इनके साथ ही दफना देना

क्योंकि जितना साथ इन

अल्हड़ शब्दों ने निभाया है

दूजा कोई क्या निभा पाता

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Saturday, April 15, 2017
Topic(s) of this poem: philosophical,words
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