आंगन को महका रहे थे Poem by Kezia Kezia

आंगन को महका रहे थे

उन नन्हे नन्हे पौधों को सहलाकर

एक स्थान से उठा कर

दूसरी मिट्‍टी में रोप रही थी

माँ जैसा स्नेह उन पर

उड़ेल रही थी

बडी सावधानी से उनकी नाजुक जड़ों को

नई जगह पर रोप रही थी

उठाते हुये एक भी कोपल टूट जाती थी तो

मन से कराह निकलती थी

उस पौध को भी वो माँ जैसा स्नेह दे रही थी

रोप कर सभी को स्नेहमयी क्यारी में

अब स्वच्छ जल से सींच रही थी

माता जैसा स्नेह उन पौधों

पर भी उड़ेल रही थी

कडी़ धूप में अपने आंचल से

उन नन्हों को भी बचा रही थी

उन नन्हे नन्हे पौधों को

वो ऐसे रोप रही थी

कुछ दिन बाद बड़े हुए

वो पौधे भी फूले फले

आज वो पौधे उसकी

बगिया महका रहे थे

आज वो फूलो को बड़े

लाड़ से सहला रही थी

नन्हे पौधे युवा होकर घर

आंगन को महका रहे थे

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Sunday, April 16, 2017
Topic(s) of this poem: nature
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