उन नन्हे नन्हे पौधों को सहलाकर
एक स्थान से उठा कर
दूसरी मिट्टी में रोप रही थी
माँ जैसा स्नेह उन पर
उड़ेल रही थी
बडी सावधानी से उनकी नाजुक जड़ों को
नई जगह पर रोप रही थी
उठाते हुये एक भी कोपल टूट जाती थी तो
मन से कराह निकलती थी
उस पौध को भी वो माँ जैसा स्नेह दे रही थी
रोप कर सभी को स्नेहमयी क्यारी में
अब स्वच्छ जल से सींच रही थी
माता जैसा स्नेह उन पौधों
पर भी उड़ेल रही थी
कडी़ धूप में अपने आंचल से
उन नन्हों को भी बचा रही थी
उन नन्हे नन्हे पौधों को
वो ऐसे रोप रही थी
कुछ दिन बाद बड़े हुए
वो पौधे भी फूले फले
आज वो पौधे उसकी
बगिया महका रहे थे
आज वो फूलो को बड़े
लाड़ से सहला रही थी
नन्हे पौधे युवा होकर घर
आंगन को महका रहे थे
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