सत्य और असत्य विधि के
सापेक्ष सार्वभौमिक तत्व हैं
कई बार सत्य की सार्थकता
असत्य के प्रमाणों पर टिकी होती है
असत्य है तभी
सत्य की प्रमाणिकता
सिद्ध हो पाती है
सत्य को सत्य
असत्य को असत्य
बताने के लिये
एक मजबूत कडी से जोड़ना पड़ता है
सापेक्षता सिद्ध करनी पड़ती है
असत्य में त्रुटि का संज्ञान होने पर ही
सत्य की खोज होती है
अन्यथा
सत्य सदियों तक
असत्य की परतों में
दुबका रहता है
किंतु जब एक बार
सत्य का चिरंजीवी प्रकाश
ब्रह्मांड को प्रकाशित कर देता है
तब
किसी भी असत्य की सापेक्षता
सत्य को प्रमाणित करने के लिये
अनिवार्य नहीं रह जाती
सभी लोकों की सापेक्षताऐं
गौण हो जाती हैं
किंतु उस बिंदु तक
सत्य और असत्य
ब्रह्मांड में सापेक्ष तत्वों की भांति
विराजमान रहते हैं
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यहाँ शायद ऐसा कुछ नहीं है जिसे परम सत्य कहा जा सके. सभी कुछ सापेक्षिक है- कम या अधिक, ऊपर या नीचे या इसी प्रकार से तुलनात्मक व सापेक्ष है. कविता में बहुत कुछ दार्शनिक चिंतन मिलता है व अत्यंत विचारणीय है: ....सत्य और असत्य / ब्रह्मांड में सापेक्ष तत्वों की भांति / विराजमान रहते हैं
बल्कुल सही. सत्य और असत्य सापेक्ष तत्व ही विदित होते हैं. कविता पसंद करने के लिये धन्यवाद श्रीमान