हर सुबह पौ फटते ही
सूरज उगते ही
दड़बे की मुर्गियाँ
अपने झुंडों में
निकल पड़ती हैं
जानी पहचानी राह पर
कुछ ही दूर जाकर
जाने पहचाने चौक पर जाकर
रुक जाती हैं
ना दाये देखती हैं
ना बाये घूमती हैं
ना आगे ही जाती हैं
ना कुछ सोचती हैं
ना कुछ विचारती हैं
भरपेट दाना पानी चुगकर
शाम को फिर
उसी जानी पहचानी राह
पर मुड़ जाती हैं
और पहुँच जाती हैं
दड़बे की मुर्गियाँ
*****
This poem has not been translated into any other language yet.
I would like to translate this poem
वाह.... मुर्गे मुर्गियों की दिनचर्या व स्वभाव का अच्छा वर्णन. Thanks.