दड़बे की मुर्गियाँ Poem by Kezia Kezia

दड़बे की मुर्गियाँ

Rating: 5.0

हर सुबह पौ फटते ही

सूरज उगते ही

दड़बे की मुर्गियाँ

अपने झुंडों में

निकल पड़ती हैं

जानी पहचानी राह पर

कुछ ही दूर जाकर

जाने पहचाने चौक पर जाकर

रुक जाती हैं

ना दाये देखती हैं

ना बाये घूमती हैं

ना आगे ही जाती हैं

ना कुछ सोचती हैं

ना कुछ विचारती हैं

भरपेट दाना पानी चुगकर

शाम को फिर

उसी जानी पहचानी राह

पर मुड़ जाती हैं

और पहुँच जाती हैं

दड़बे की मुर्गियाँ

*****

Sunday, April 16, 2017
Topic(s) of this poem: philosophical
COMMENTS OF THE POEM
Rajnish Manga 16 April 2017

वाह.... मुर्गे मुर्गियों की दिनचर्या व स्वभाव का अच्छा वर्णन. Thanks.

1 0 Reply
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