एक कबूतर की मौत Poem by Kezia Kezia

एक कबूतर की मौत

Rating: 5.0

बहुत तेज़ गति से आती गाड़ी

के घूमते पहिये के नीचे चिथ गया

वो कबूतर जो

सड़क पर बिखर गये दानो को

चुगने गया था

कूद कूद कर एक एक दाने पर

धाबा बोल रहा था

आँखे मूंदकर बीच बीच में

पंखों को फडफड़ा रहा था

तभी एक बहुत तेज़ दौड़ती गाड़ी की

चपेट में आ गया

और चिथ गया दानो के साथ

फिर तो ना जाने कितने घूमते पहियों के

नीचे पिस गया

खून से लथपथ उसके पंख फले गये थे

सड़क की कंक्रीट में उसके

जो अंश फंस गये थे

वोही वहाँ बाकी रह गये थे

दाने चुगता क्षण भर मे

आंखे मूंदे कूदता कबूतर

तिनका तिनका होकर एक

सदी की तरह बिखर गया

उसे कहां कानून का संज्ञान था

उसके लिये कहाँ किसी अदालत मे

पेशी लगाई जायेगी

उसे कहाँ प्रकृति ने पढ़ना लिखना सिखाया था

पहिये उसके पंखो को गले से लगाये

अब भी उसी रास्ते पर

बेहिचक बेलगाम दौड़ रहे थे

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COMMENTS OF THE POEM
Rajnish Manga 19 April 2017

अपने दानापानी के जुगाड़ में लगे निरीह कबूतर (या कहें कि प्राणी मात्र) को अक्सर उनके सामने दरपेश खतरे का भान ही नहीं हो पाता और वे अकस्मात् अपनी जान से हाथ धो बैठते हैं. अत्यंत मार्मिक कविता. धन्यवाद.

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