कागज़ की शिकायत Poem by Kezia Kezia

कागज़ की शिकायत

एक दिन कागज़ शिकायत कर बैठा,

कई दिनों से था जो रूठा रूठा

ख़ामोशी को तोड़ कर,

मन के क्लेश को छोड़कर

बोला

"अपने दिल से बोझ उतार कर मुझ पर धर देते हो,

किस्से और कहानी सबकी मुझ पर मड़ देते हो

सौ योजन का समुद्र हो या आसमान का छोर,

मुझ तक पहुँचा ही देते हो हर एक तुम्हारा शोर

दिल के अरमान और आँखों का पानी,

मुझे भिगो देती है हर एक तुम्हारी कहानी

मेरे कोरे भाग्य को स्याह कर देते हो,

व्यंग और आलोचना से मुझको पीड़ा देते हो

वंदना से विरह गीत तक सुशोभित करते मेरे माथे पर,

कोरी कल्पना से आडम्बर तक सब कुछ लिखते हो मुझ पर

इतिहास का साक्षी बनकर, हर युद्ध की गाथा गाई,

जितने युग बीते, हर एक की कथा सुनाई

मेरी कोरी काया को जबरन मैला करते हो,

अपने दिल से बोझ उतार कर मुझ पर धर देते हो"

Friday, May 12, 2017
Topic(s) of this poem: philosophical
COMMENTS OF THE POEM
Rajnish Manga 12 May 2017

कागज़ की शिकायत भरी आपबीती. बहुत सुन्दर रचना. धन्यवाद. अपने दिल से बोझ उतार कर मुझ पर धर देते हो, मेरी कोरी काया को जबरन मैला करते हो,

2 0 Reply
Kezia Kezia 12 May 2017

thanks sir for valuable comment and liking this poem

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