बैठी थी सड़क के किनारे
अपने दुखों की पोटली सम्भाले
मैले कुचैले चीथड़ों मे तन को ढँके हुए
बिना कुछ भी बोले हुए
चेहरे को झुकाती
वो बूढ़ी भिखारिन बेबसी पर रोती
आने जाने वाले मुँह फेर निकल जाते
क्यों ऐसी मुसीबत गले लगाते
मुख से उसके आशीष निकलते
हाथ ना फैला पाती थीं
जाने क्या मजबूरी आड़े आती थी
हड्डियों का एक पिंजर नज़र आती थी
हर दिन कितनी तकलीफें सहती थी
दो जून रोटी के लिये कितनी यातनाऐं सहती
रोटी मिले ना मिले, गालियाँ बेशुमार खाती
साँझ हो गयी, पर झोली फिर भी खाली
खांस खांस कर आँतें आ गई गले में
बेचारी आज फिर सो जाएगी फाके में
लाठी टेक कर चलने लगी
अचानक सिक्कों की खनक से जगी
देखा, एक बूढ़ा अपाहिज भिखारी
उसके आगे, अपनी झोली कर गया खाली
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कोई अतिशयोक्ति नहीं. केवल सहानुभूति का एक अप्रत्याशित भाव वहां से मिलना जहाँ से इसकी कोई उम्मीद नहीं थी लेकिन एक ही पथ के यात्री एक दूसरे का सहारा बनने के दावेदार तो हो ही सकते हैं. बहुत सुंदर अभिव्यक्ति.