दानी Poem by Kezia Kezia

दानी

बैठी थी सड़क के किनारे
अपने दुखों की पोटली सम्भाले
मैले कुचैले चीथड़ों मे तन को ढँके हुए
बिना कुछ भी बोले हुए
चेहरे को झुकाती
वो बूढ़ी भिखारिन बेबसी पर रोती
आने जाने वाले मुँह फेर निकल जाते
क्यों ऐसी मुसीबत गले लगाते
मुख से उसके आशीष निकलते
हाथ ना फैला पाती थीं
जाने क्या मजबूरी आड़े आती थी
हड्डियों का एक पिंजर नज़र आती थी
हर दिन कितनी तकलीफें सहती थी
दो जून रोटी के लिये कितनी यातनाऐं सहती
रोटी मिले ना मिले, गालियाँ बेशुमार खाती
साँझ हो गयी, पर झोली फिर भी खाली
खांस खांस कर आँतें आ गई गले में
बेचारी आज फिर सो जाएगी फाके में
लाठी टेक कर चलने लगी
अचानक सिक्कों की खनक से जगी
देखा, एक बूढ़ा अपाहिज भिखारी
उसके आगे, अपनी झोली कर गया खाली
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Saturday, May 13, 2017
Topic(s) of this poem: poverty
COMMENTS OF THE POEM
Rajnish Manga 13 May 2017

कोई अतिशयोक्ति नहीं. केवल सहानुभूति का एक अप्रत्याशित भाव वहां से मिलना जहाँ से इसकी कोई उम्मीद नहीं थी लेकिन एक ही पथ के यात्री एक दूसरे का सहारा बनने के दावेदार तो हो ही सकते हैं. बहुत सुंदर अभिव्यक्ति.

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