अनसुना Poem by Kezia Kezia

अनसुना

वह आती है
कुछ देर ठहर कर
चली जाती है
मैं कुछ कहता हूँ
वह सुनकर भी
अनसुना कर देती है
मैं फिर दोहराता हूँ
वह फिर अनसुना
कर देती है
वह कुछ नहीं कहती
मैं सुनना चाहता हूँ
मैं सुनना चाहता हूँ,
जिंदगी भर
फिर भी वह कुछ
नहीं कह पाती
वह डरती है
कहीं उसकी तरह
उसका कहा
मैं अनसुना ना कर दूँ
इस डर से
वह कभी कुछ भी
नही कहती
बस आती है
कुछ देर ठहर कर
चली जाती है
*****

Sunday, May 14, 2017
Topic(s) of this poem: philosophical
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