एक छोटा सा महान शब्द "माँ" Poem by Kezia Kezia

एक छोटा सा महान शब्द "माँ"

किसी ने मुझसे पूछा
तुमने हर विषय पर कुछ ना कुछ लिखा
माँ शब्द पर क्यों नहीं लिखा
यह शब्द मस्तिष्क से कैसे फिसल गया
दो घड़ी रुककर
मंथन कर मैंने कहा
यह विषय नही, गूढ़ विषय है
इस शब्द के लिये मेरी रचना तुच्छ है
इस एक शब्द की विवेचना के लिये
शब्द कहां से लाऊँ
वो मरम कहाँ से लाऊँ
वो सार कहाँ से लाऊँ
जिससे इस छोटे से महान शब्द की
आत्मा को सजाऊँ
कहाँ से लाऊं वो शब्द
जो नाप सके उन रातों की लम्बाईयाँ
जो आँखों मे गुजारी उसने
मुझे नींद देने के लिये
कहाँ से लाऊँ वो पैमाना
जो नाप सके उन पलों को
जो मेरे बचपन को सवांरने
अपनी उम्र का गुज़ारा
कहते हैं वो बंधी है
कर्तव्य से, नियमों से
वो बंधी है अपने उच्च कर्मो के फलों से
नही वो तो बँधी है मात्र एक शब्द की डोर से
एक शब्द जो उसके अंतस को
परम शांति देता है
अपना सारा जीवन गवांती है
"माँ" शब्द को कानों मे पहनने के लिये
ये शब्द संसार की संरचना का सेतू है
हर एक चीज को देखने का हेतू है
सैंकड़ों कोड़ों सी वेदना को सहती है
जब जीवन को सृजित करती है
सृष्टि के सभी शब्द थोड़े हैं
इस एक शब्द का बखान करने के लिये
शब्द नही है मेरी कलम मे
नही बाँध सकता
उसके असीम निश्छल प्रेम को
अपने सीमित और भौंडे शब्दों में
नही कभी नही
******

COMMENTS OF THE POEM
Rajnish Manga 14 May 2017

माँ की ममता को समर्पित एक सुंदर कविता. हार्दिक धन्यवाद. कविता के कुछ अंश उद्धृत है: वो सार कहाँ से लाऊँ.... जो नाप सके उन रातों की लम्बाईयाँ जो आँखों मे गुजारी उसने.... मेरे बचपन को सवांरने

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