चिंतित सी एक भोर ने
व्याकुल से सूरज को देखा
किंचित भ्रम उसे हुआ
वो है जुगनु चमकीला,
या कोई भोर का तारा
मद्दम जगमग, शीतल आवास
सुनहरी किरणें, बिखरा सतरंगी प्रकाश
प्रकाश में खो गई भोर सुहानी
मिथ्या हो गयी व्यकुलता सारी
किरणों ने रची एक नई कहानी
धरती ने उतारी चुनरी पुरानी
नये आवरण मे सज कर
नई नवेली दुल्हन बनकर
सज रही करने सुबह की सवारी
पँछी मंगल गान सुनाते
नदी झरने नये नये राग है गाते
पेड़ पौधे भी झूमते नाचते
जब देखते सुंदर मोर को पंख फैलाते
रात के तारे फूलो मे खिल जाते
नई उर्जा का गुणगान जब करते
अंधकार कहीं छुप कर सो जाता
चहुँओर जब सूरज उजियारा फैलाता
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