जिंदगी का फलसफा Poem by Kezia Kezia

जिंदगी का फलसफा

चिड़िया चोंच भर चुग्गा चुगती है


और उड़ जाती है
 

ढेर अनाज का वही छोड़ जाती है
 

इतनी आसानी से
 

जिंदगी का फलसफा सीखा जाती है
 

नीले विशाल गगन में
 

संचय कभी नही करती है
 

पर भूखी भी नही रहती है
 

मैं धन संचय करता हूँ
 

निश्चित परिधि मे रहता हूँ
 

दिन रात लोभ में फसंता हूँ
 

फिर भी भरपेट नही खा पाता हूँ
 

संचित धन को यहीं के लिये कमाता हूँ
 

और यही छोड़ कर जाता हूँ

Monday, June 5, 2017
Topic(s) of this poem: philosophical
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