Kezia Kezia


एक प्रश्न - Poem by Kezia Kezia

एक प्रश्न

फिर उभरा

हर बार की तरह

दिमाग में गरजा

जिंदगी को बेहद तस्सली से बुना

ग़मों के गुलशन से भी खुशी को चुना

आज जिंदगी घिस कर फटने लगी है

मैं रफू कर कर के हारी

फिर भी क्यों

ये चिथड़े हो कर मानी

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Topic(s) of this poem: philosophical


Comments about एक प्रश्न by Kezia Kezia

  • Rajnish MangaRajnish Manga (6/13/2017 7:21:00 AM)

    आपकी कविता में भावों की तीव्रता पाठक को बहुत प्रभावित करती है. यहाँ बावजूद ईमानदार कोस्जिश के सब कुछ खो देने का ग़म उभर का सामने आता है. ऐसी गहरी अभिव्यक्ति कम ही देखने में आती है. धन्यवाद. कुछ पंक्तियाँ उद्धृत करता हूँ:
    जिंदगी को बेहद तस्सली से बुना /....फिर भी क्यों / ये चिथड़े हो कर मानी
    (Report)Reply

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  • Mohammed Asim Nehal (6/13/2017 6:55:00 AM)

    Bahut Khoob....Kya varnan kiya hai aapne zindagi ka...Ati Uttam.10++++ (Report)Reply

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Poem Submitted: Tuesday, June 13, 2017



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