वो कश्ती पड़ी हुई है आज बेजान Poem by Kezia Kezia

वो कश्ती पड़ी हुई है आज बेजान

वो कश्ती पड़ी हुई है आज बेजान

जो पानियो पर बहा करती थी

उसे बहा ले जाने के लिए

आज न नदी की धार है

ना पानियो की फुहार है

आज वो कश्ती खुद नदी की तली के

रेत में समा जाने वाली है

नदी कश्ती को पुकार रही है

कश्ती माझी को पुकार रही है

माझी अपने मुक्कदर को तलाश रहा है

हर छूटी हुई सांस को अंतस में जगा रहा है

कश्ती टूटकर टुकड़ो में बिखरी जा रही है

नदी के बहाव को अब भी अपने तन पर पा रही है

उस सूखे रेत से ही अपने चप्पुओं को चला रही है

वो कश्ती उस नदी की तली में जा समा रही है

जो उसकी लहरों पर खिलखिलाकर गोते खाती थी

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Tuesday, August 8, 2017
Topic(s) of this poem: philosophical
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