पूनम की उजियारी रजनी में, ठंडी ठंडी पवन चली ।
गुनगुन गुनगुन मस्त समां, रजनीगंधा की खिली कली ।।
लाल चुनरिया मनभावन, रात्रि ने श्रृंगार किया ।
झिलमिल जड़े सितारे भी, होगा बस अब मिलन पिया ।।
सोच रही थी भर लूंगी, चांद पिया आलिंगन में।
प्रेम करूंगी मैं तब तक, जब आ जाए सवेरा आंगन में ।।
लेकिन उफ्फ! यह हुआ है क्या! चंदा क्यों है मौन पड़ा ।
*हुआ नपुंसक हो जैसे, या जैसे कोई पेड़ कटा।।*
मन बिखर गया बन कर कण कण, अकथ्य वेदना से भर कर ।
लाल चुनरिया में लिपटी, रात बन गई ज्यों पत्थर ।।
कोई ना जाने समझे ना कोई, पीर रात के मनवा की ।
मतलबी चंद्रमा हुआ शिखंडी, क्या समझे अभिलाषा मन की ।।
कहो यदि कुछ तुम मुझको, तब तो मैं कोई मदद करूं।
अगर कहोगी तुम मुझको, मैं जी भर तुमको प्रेम करूं।।
पिया मिलन उम्मीद लिए, हर रात दुल्हन सी सजी रही ।
चांद कलाएं तो दिखलाता, किंतु रहा शिखंडी ही ।।
प्यारे पंछी बने वन्य, ऐसे ही हालातों में।
जब चांद नपुंसक हो जाए, उत्तप्त नशीली रातों में ।।
जब सिंदूर मांग में दुल्हन की, भरता ही जाए भर भर कर ।
होकर संचित फिर जम जाता, बन बर्फ गिरे झर, झर झर झर ।।
वन्य चिरैया ऐसे ही, अनजान अंगनवा जाती है ।
मनभावन कुछ करतब करके, कुछ बात बनाके लुभाती हैं ।।
चंद घरौंदे ऐसे ही, बस बिखर बिखर गिर जाते हैं।
कुछ बनते हैं कुछ गिरते हैं, कुछ बनते बनते रह जाते हैं।।
सृष्टि का यह खेल यूं ही, अनवरत निरंतर चलता है ।
नियति का यह खेल यूं ही, निष्बाध निरंतर चलता है ।।
original Gayatri phukan translated by Sudhir Astha
This poem has not been translated into any other language yet.
I would like to translate this poem