मैंने जब चाहा जिसे चाहा बस प्यार किया
प्यार के नाम पे सबकुछ अपना वार दिया
दिल मे कुछ हो और ज़ुबाँ पे कुछ
ऐसा गुनाह मैंने ना एक भी बार किया
वो बदलने के लिए थेतो वो बदलते ही रहे
मैने दिल से जो कभी किसी पे भी ऐतबार किया
जितना चाहा था हमने बस उतनी ही हसरत की थी
उससे कम पे भी कभी ना राज़ी हुआ ना इक़रार किया
उनको जाना था तो वो जाके ही माने
बहुत रोका भी और बहुत इसरार किया
मेरे बिन जीना था तो मोहब्बत क्यों की थी
क्या मिला जो मेरा जीना भी दुश्वार किया
किस क़दर चाह थी तुझमे मुझे पाने की
फिर दग़ा क्यूँ तुमने ऐ मेरे यार किया
हँस के कहते कि ज़हर है तो मैं पी लेता
तेरी किस बात का मैंने कभी इनकार किया।
This poem has not been translated into any other language yet.
I would like to translate this poem
बहुत खुबसूरत.शेयर करने के लिए आपका धन्यवाद, मित्र.