दिल मे कुछ हो और ज़ुबाँ पे कुछ Poem by Ahatisham Alam

दिल मे कुछ हो और ज़ुबाँ पे कुछ

Rating: 5.0

मैंने जब चाहा जिसे चाहा बस प्यार किया
प्यार के नाम पे सबकुछ अपना वार दिया

दिल मे कुछ हो और ज़ुबाँ पे कुछ
ऐसा गुनाह मैंने ना एक भी बार किया

वो बदलने के लिए थेतो वो बदलते ही रहे
मैने दिल से जो कभी किसी पे भी ऐतबार किया

जितना चाहा था हमने बस उतनी ही हसरत की थी
उससे कम पे भी कभी ना राज़ी हुआ ना इक़रार किया

उनको जाना था तो वो जाके ही माने
बहुत रोका भी और बहुत इसरार किया

मेरे बिन जीना था तो मोहब्बत क्यों की थी
क्या मिला जो मेरा जीना भी दुश्वार किया

किस क़दर चाह थी तुझमे मुझे पाने की
फिर दग़ा क्यूँ तुमने ऐ मेरे यार किया

हँस के कहते कि ज़हर है तो मैं पी लेता
तेरी किस बात का मैंने कभी इनकार किया।

दिल मे कुछ हो और ज़ुबाँ पे कुछ
Wednesday, January 31, 2018
Topic(s) of this poem: love
POET'S NOTES ABOUT THE POEM
As
COMMENTS OF THE POEM
Rajnish Manga 31 January 2018

बहुत खुबसूरत.शेयर करने के लिए आपका धन्यवाद, मित्र.

0 0 Reply
READ THIS POEM IN OTHER LANGUAGES
Close
Error Success