ना उन्हे कुछ कहना था Poem by Kezia Kezia

ना उन्हे कुछ कहना था

ना उन्हे कुछ कहना था
ना मुझे कुछ सुनना था
बस शाम का मंज़र था
जिसे धूल मे दफनाना था
ना उन्होंने कुछ कहा
ना मैंने कुछ सुना
आसमान से गिरती बूंदो में ज़रा
शब्दों को ढूँढने का बहाना था
ना उन्हे कहीं जाना था
ना मुझे कहीं से आना था
बस तारों भरी रात पर
इल्ज़ाम बेवजह लगाना था
ना उन्हे किसी का इंतजार था
ना मुझे किसी पर ऐतबार था
मौसम की मासूमियत से
शिकवा वही पुराना था
ना उन्हे साथ निभाना था
ना मुझे इकरार जताना था
पर दो किनारों को मिलाने का
नामुमकिन एक फैसला हमारा था
ना उन्हे कुछ गुनगुनाना था
ना मुझे कोई तराना सुनाना था
यूँहि टूटे दिल के तारों पर
तान छेड़ना शौक हमारा था
***

Sunday, September 9, 2018
Topic(s) of this poem: love
COMMENTS OF THE POEM
Rajnish Manga 09 September 2018

दिल के तारों को छू कर तरन्नुम उत्पन्न करने वाली एक प्रभावशाली नज़्म. धन्यवाद. कुछ पंक्तियाँ इसी नज़्म से: आसमान से गिरती बूंदो में ज़रा शब्दों को ढूँढने का बहाना था ना उन्हे कहीं जाना था ना मुझे कहीं से आना था

0 0 Reply
Naila Rais 09 September 2018

Wonderful.......10+++++++++++++++++++++++ You may like to read my poems and express your views too.. Naila

1 0 Reply
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