ना उन्हे कुछ कहना था
ना मुझे कुछ सुनना था
बस शाम का मंज़र था
जिसे धूल मे दफनाना था
ना उन्होंने कुछ कहा
ना मैंने कुछ सुना
आसमान से गिरती बूंदो में ज़रा
शब्दों को ढूँढने का बहाना था
ना उन्हे कहीं जाना था
ना मुझे कहीं से आना था
बस तारों भरी रात पर
इल्ज़ाम बेवजह लगाना था
ना उन्हे किसी का इंतजार था
ना मुझे किसी पर ऐतबार था
मौसम की मासूमियत से
शिकवा वही पुराना था
ना उन्हे साथ निभाना था
ना मुझे इकरार जताना था
पर दो किनारों को मिलाने का
नामुमकिन एक फैसला हमारा था
ना उन्हे कुछ गुनगुनाना था
ना मुझे कोई तराना सुनाना था
यूँहि टूटे दिल के तारों पर
तान छेड़ना शौक हमारा था
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Wonderful.......10+++++++++++++++++++++++ You may like to read my poems and express your views too.. Naila
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दिल के तारों को छू कर तरन्नुम उत्पन्न करने वाली एक प्रभावशाली नज़्म. धन्यवाद. कुछ पंक्तियाँ इसी नज़्म से: आसमान से गिरती बूंदो में ज़रा शब्दों को ढूँढने का बहाना था ना उन्हे कहीं जाना था ना मुझे कहीं से आना था