वैसे तो सूरज और चांद का साथ
होता है जन्मों जन्मों के बंधन समान
फिर भी सूरज के चमक के आगे
नतमस्तक होता है सारा जहान।।
और जब पूरा होता है समय
अपने धीमे धीमे कदमों को खींचता
लालिमा बिखेरते हुए, ये सूरज
आमंत्रित करता चंद्रमा विस्मित को।।
जो शीतलता का स्वच्छ चादर ओढ़े हुए
पायल के छमछम से मंत्रमुग्ध करती हुई
सूरज के धधकते लौ को शांत करती हुई
रात की सादगी को चांदनी की चादर ओढ़ाते हुए।।
खीच ले चलती हमे उन गुमनाम गलियों में
जहां छुपा रखा हमने अपने सापने सुहावने
और बुनती जाति ताना बाना जो हमने सोचा भी न था कभी
वो बीज बो जाति, धीमे से मन में मेरे, बिना बेखौफी के।।
ताकि जब मैं सुबह का सूरज देखू
तो मन मेरा प्रफुल्ल हो मानो जैसे
कुबेर का खजाना ढूंढ लिया हो मैने
और आशाओं का बगिया खिल गया हो जैसे।।
बनाती जाति मेरे सूखे जिंदगी को
आशिया सुहावने सापनो का
जिन्हें दिन बुला रहा नाम ले ले के
कौन जाने किसका नंबर लग जाए सुबह सवेरे।।
© वर्षा मधुलिका
०८.०६.२०२१.
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