बहता सागर Poem by Varsha M

बहता सागर

ययूं हो मैंने ये सोचा न कभी
की कल कल करती नदिया
किन वादियों की ओर कर रही इशारा।।।

पर आज जब टूटे मन के साथ
नदी के कलकल को सुनता मेरा ये मन
उसकी अनकही तनहाई को महसूस क्या एकदम।।

और दंग खड़ा रह गया बूथ समान सब्धहीन।
हाय उसकी दबी हुई फिर भी व्यथित चीखे
कानों को चीरती हुई सीधे मन में उतर गई।।

मानो जैसे मुख्य संगीतज्ञ के साज़ के बोल हो
जो हवाओं के साथ कूदती फंडती पाउच ही गई
विरह की ज्वलित तड़प बयाने अपनी जुबानी।।

यूं हो मुझे दूसरों के पछड़े में पड़ना पसंद नहीं
पर न जाने आज क्यों ये मेरा दिल फस रहा इस कशिश में
जो मुझे मेरी पीड़ा स्मरण करा संवेदनशील करा जा रहा।।


और उकसा रहा हर पल, 'उठ और लड़'
उठ और लड़ अपने आनेवाले कल के लिए
क्योंकि काला न होगा अब मेरा एक पल भी।।

जीवन का ये सबब गांठ बंधी मैंने आज
चाहे हो दुःख का बवंडर या खुशी बेशुमार
हसने का बहाना तो ढूंढना है मैंने हर हाल में।।

क्योंकि हंसी बिना जीवन नहीं
जी नहीं तो जहान नहीं
जहान बिना मैं भी कुछ नहीं।।

खुशी का सबक सिखा गई ये बेहती नदी
चाहे आए गहन खाई या पर्वत विशाल
छोड़ेंगे न हम दमन आचाई का जो ले मुस्कान।।

© वर्षा मधुलिका
१६.०६.२०२१.

बहता सागर
Tuesday, June 15, 2021
Topic(s) of this poem: pain,river,smile
POET'S NOTES ABOUT THE POEM
Free flowing river is my inspiration. The image was alluring and I wanted some hopeful poem for the same. Today when I wrote this poem I think this image suits best.
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