राह में चलते चलते
न जाने कब हम
तानाओं में रमते गए
और अपने आप को भूल गए
और बन गए शागिर्द उनके
जो कभी चाहे ही न बढ़ती मेरी।।
पगला पंडित बन गए हम
कुचल कुचल मनवा अपने
हाय रे दैय्या क्या कर बैठे।।
खुद को गुमनाम गलियों में
छोड़ आए तहे दिल से
ये भी न पूछा क्या रह पाओगे मेरे बिना।।
जंगली जानवर समान
न सोचा, न समझा
बस कर आए जो लोगों ने कहा।।
हाय रे ये डोलता मन मेरा
सुन न सका अपना ये रोदन
जो बयां कर रही दुविधा अनगिनत।।
पर मैं तो आंखे चार करता रहा
और दिन रात खोखले सपने बुनता रहा
छली गगन चुंबन का भ्रम आंख मे लिए।।
अनजान और अनभिज्ञ मैं
इन सब प्रतिबिंबित मृगतृष्णा से
जो और कुछ नही बस आंखों का धोखा है।।
पल भर का छलावा है
जिंदगी भर का कारावास है
अपने ही हाथों अपना विनाश है।।
जो मैंने अपना कारवां छोड़
दुश्मन के खेमे में पांव धरा
क्षत विक्षत करता रहें अपने ही को।।
जिंदगी भी बेवकूफों का जमघट नहीं
पर एक करारे तमाचे का गुंजन है
की अभी समय है ओ! बाबू संभाल जाओ।।
ओजान लो ओ! नादान मुसाफिर
हम हैं तो जहान है
पल भर का सुख सब दिखावा है।।
कर लो तुम ये वादा आपने से आज
चाहे जो हो जाए मगर
मरने न देंगे अपने को एक बार भी अब।।
०६.०७.२०२१
© वर्षा मधुलिका
This poem has not been translated into any other language yet.
I would like to translate this poem