अपने आप को पहचाने Poem by Varsha M

अपने आप को पहचाने

राह में चलते चलते
न जाने कब हम
तानाओं में रमते गए

और अपने आप को भूल गए
और बन गए शागिर्द उनके
जो कभी चाहे ही न बढ़ती मेरी।।

पगला पंडित बन गए हम
कुचल कुचल मनवा अपने
हाय रे दैय्या क्या कर बैठे।।

खुद को गुमनाम गलियों में
छोड़ आए तहे दिल से
ये भी न पूछा क्या रह पाओगे मेरे बिना।।

जंगली जानवर समान
न सोचा, न समझा
बस कर आए जो लोगों ने कहा।।

हाय रे ये डोलता मन मेरा
सुन न सका अपना ये रोदन
जो बयां कर रही दुविधा अनगिनत।।

पर मैं तो आंखे चार करता रहा
और दिन रात खोखले सपने बुनता रहा
छली गगन चुंबन का भ्रम आंख मे लिए।।

अनजान और अनभिज्ञ मैं
इन सब प्रतिबिंबित मृगतृष्णा से
जो और कुछ नही बस आंखों का धोखा है।।

पल भर का छलावा है
जिंदगी भर का कारावास है
अपने ही हाथों अपना विनाश है।।

जो मैंने अपना कारवां छोड़
दुश्मन के खेमे में पांव धरा
क्षत विक्षत करता रहें अपने ही को।।

जिंदगी भी बेवकूफों का जमघट नहीं
पर एक करारे तमाचे का गुंजन है
की अभी समय है ओ! बाबू संभाल जाओ।।

ओजान लो ओ! नादान मुसाफिर
हम हैं तो जहान है
पल भर का सुख सब दिखावा है।।

कर लो तुम ये वादा आपने से आज
चाहे जो हो जाए मगर
मरने न देंगे अपने को एक बार भी अब।।

०६.०७.२०२१
© वर्षा मधुलिका

अपने आप को पहचाने
Monday, July 5, 2021
Topic(s) of this poem: respect
POET'S NOTES ABOUT THE POEM
We all begin our lesson by imitation but in due course forget that we have our identity and we don't need to follow everything like a blind man. respect yourself and walk with confidence. It is good to take help but not to become a slave. Photo courtesy in article by Ajit Kumar Bishnoi in the pioneer ' correct your self-image.'
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