शहर और देहात Poem by Ajay Amitabh Suman

शहर और देहात

Rating: 5.0

मेरे गाँव में होने लगा है,
शामिल थोड़ा शहर,
फ़िज़ा में बढ़ता धुँआ है,
और थोड़ा सा जहर।
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मचा हुआ है सड़कों पे,
वाहनों का शोर,
बुलडोजरों की गड़गड़ से,
भरी हुई भोर।
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अब माटी की सड़कों पे,
कंक्रीट की नई लहर,
मेरे गाँव में होने लगा है,
शामिल थोड़ा शहर।
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मुर्गे के बांग से होती,
दिन की शुरुआत थी,
तब घर घर में भूसा था,
भैसों की नाद थी।
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अब गाएँ भी बछड़े भी,
दिखते ना एक प्रहर,
मेरे गाँव में होने लगा है,
शामिल थोड़ा शहर।
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तब बैलों के गर्दन में,
घंटी गीत गाती थी,
बागों में कोयल तब कैसा,
कुक सुनाती थी।
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अब बगिया में कोयल ना,
महुआ ना कटहर,
मेरे गाँव में होने लगा है,
शामिल थोड़ा शहर।
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पहले सरसों के दाने सब,
खेतों में छाते थे,
मटर की छीमी पौधों में,
भर भर कर आते थे।
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अब खोया है पत्थरों में,
मक्का और अरहर,
मेरे गाँव में होने लगा है ,
शामिल थोड़ा शहर।
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महुआ के दानों की ,
खुशबू की बात क्या,
आमों के मंजर वो,
झूमते दिन रात क्या।
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अब सरसों की कलियों में,
गायन ना वो लहर,
मेरे गाँव में होने लगा है ,
शामिल थोड़ा शहर।
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वो पानी में छप छप,
कर गरई पकड़ना,
खेतों के जोतनी में,
हेंगी पर चलना।
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अब खेतों के रोपनी में,
मोटर और ट्रेक्टर,
मेरे गाँव में होने लगा है,
शामिल थोड़ा शहर।
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फ़िज़ा में बढ़ता धुँआ है,
और थोड़ा सा जहर।
मेरे गाँव में होने लगा है,
शामिल थोड़ा शहर।
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अजय अमिताभ सुमन
सर्वाधिकार सुरक्षित

शहर और देहात
COMMENTS OF THE POEM

2. I loved the rhyme scheme too.

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A heartbreaking lament on the evils of urbanisation creeping in into our gaudy peaceful, agriculture oriented villages. Beautifully written. Top score.

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Ajay Amitabh Suman

Chapara, Bihar, India
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