मुझे लगता है Poem by Sankhajit Bhattacharjee

मुझे लगता है

केदार देखकर
लगता है
जीते रहूँ तूफान में
अंतिम समय तक।

गंगा देखकर
लगता है
बहता रहूँ बंधन में
अंतिम साँस तक।

खेत की हरियाली देखकर
लगता है
युवा रहूँ बुढ़ापा में
अंतिम यात्रा तक।

थार देखकर
लगता है
उड़ता रहूँ आंधी में
अंतिम कड़ी तक।

हिन्द महासागर देखकर
लगता है
घूमता रहूँ घूर्णी में
अंतिम सूर्यास्त तक।

भारत माता को देखकर
लगता है
खिलता रहूँ उनकी गोद में
अंतिम संस्कार तक।

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