मन की बात: 1 मन.......! Poem by Devanshu Patel

मन की बात: 1 मन.......!

विषय: मन.....!

हे मन! इस संसार में भात भात के लोग
जैसा जिस का अन्न हो, वैसा मन भी होय....

हे मन! दया न कर कभी जो तन साबूत होय
बैठन बैठन खाइके, ये मन भिखारी होय......

बारिश प्रभु के प्रेम की हो रही है चहुँ ओर
मन छाता लिए मोह का फिरे तो फिर क्या होय....

तन भीगा गर क्या हुआ मन भीगा नहीं होय
कोशिश कर लो लाख पर, पत्थर दिल भीगा न होय....

हे मन! सुन सब की भले, मान कभी ना एक
कर तू दिल की सब कही, दिल को लगे जो नेक.....

गोरा तन मिला क्या भया जो मन काला भूत
काला मन कालिख़ पोत दे जैसे कोई कपूत.....

मन के जीते जित है, और मन के हारे हार
कर्ता हर्ता मन ही है, मन में शक्ति अपार.....

(क्रमशः)

© देवांशु पटेल
शिकागो
6/4/2018

मन की बात: 1 मन.......!
COMMENTS OF THE POEM
Abhipsa Panda 12 November 2018

Awesome poetry.....it is like over the above....thanks for sharing..

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Devanshu Patel

Devanshu Patel

Kapadwanj, Gujarat (India)
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