A-060. पगला कहीं का Poem by Amrit Pal Singh Gogia

A-060. पगला कहीं का

पगला कहीं का 27.4.16—6.16 AM

मेरी नन्ही सी जान
मैं तुझ पे कुर्बान
नज़र न तुमको लग जाये
तुम ही तो हो मेरी जान
माँ कहती है.. पगला कहीं का ……

जल तरंगों से खेला करता हूँ
लंगोट भी गीला करता हूँ
हलवा पूड़ी करता हूँ
किसी से नहीं डरता हूँ

माँ को गुस्सा आता है
मेरा मन मुस्कराता है
माँ कहती है.. पगला कहीं का ……

मुख में बेचैनी होती है
मन में घबराहट होती है
जो मिलता वही चबाता हूँ
माँ से नज़रेँ मैं चुराता हूँ

गले में कुछ फँस जाता है
तब माँ को गुस्सा आता है
चाँटा वो दिखाती है
पगला मुझे बनाती है
माँ कहती है.. पगला कहीं का ……

निक्कर खुद ही डाला करो
बस्ता खुद संभाला करो
खाना खुद ही खाया करो
अपनी बात बताया करो

कपड़े तुम को बदलने हैं
होम वर्क तुमको करने हैं
ट्यूशन भी तुमको जाना है
खेल में भी अव्वल आना है

होड़ में नहीं घबराना है
चेहरे से मुस्कराना है
सबको डांस दिखाना है
साथ में गाना गाना है
माँ कहती है.. पगला कहीं का ……

सारेगामा में भी जाना है
गाना भी तुमको गाना है

चाहे जितने भी दुखी रहो
आँटी को नमस्ते बुलाना है
तहजीब तुम्हें अब आनी है
पुरानी बातें सब भुलानी हैं
मुस्कराकर नमस्ते बुलाकर
कहानी भी सबको सुनानी है

सब से अच्छा बन के रहता हूँ
किसी को कुछ नहीं कहता हूँ
फिर भी मुझे..माँ कहती है..
पगला कहीं का ….. पगला कहीं का…...


Poet; Amrit Pal Singh Gogia 'Pali'

A-060. पगला कहीं का
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