A-081. कि मैं सही हूँ Poem by Amrit Pal Singh Gogia

A-081. कि मैं सही हूँ

कि मैं सही हूँ..8.6.15—9.17PM

सच और झूठ का झगड़ा हो गया
अस्तित्व बचाने का रगड़ा हो गया

बहस छिड़ी खुद को बचाने के लिए
अपना अपना नाम कमाने के लिए

अपने आप को सही बताने के लिए
एक दूसरे को गलत ठहराने के लिए

अकड़ दिखा यह बात बताने के लिए
जो करना है कर लो बचाने के लिए

प्रमाण भी इकट्ठे किये दिखाने के लिए
यह बात दूसरोँ को समझाने के लिए

हार जीत का फैसला हराने के लिए
दुनिया को यह दिखाने के लिए
कि मैं सही हूँ………।

जब देखा तो बहुत कुछ खो चुका था मैं

प्यार का कुछ समझ आया नहीं
अपनेपन को कोई साया नहीं
जोश उमंग के चिथड़े उड़ गए
सेहत से न जाने कब उलझ गए

अभिव्यक्ति न जाने कहाँ खो गई
शांति न जाने कैसे भंग हो गई
संतोष पूर्ती मन की बेरंग हो गई

करना तो एक का ही चुनाव था
जब मैंने छोड़ा कि मैं सही हूँ
जिंदगी गले मिली कि मैं वही हूँ
कि मैं वही हूँ……

Poet: Amrit Pal Singh Gogia 'Pali'

A-081. कि मैं सही हूँ
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