A-082. तेरी खामोश निगाहें Poem by Amrit Pal Singh Gogia

A-082. तेरी खामोश निगाहें

तेरी खामोश निगाहें 25.5.16—4.00 AM

तेरी खामोश निगाहें
कुछ कहना चाहती हैं उनको कहने दो

तेरे चेहरे की उदासी
कुछ सहना चाहती है उसको सहने दो

तेरे ये जज्बात
थोड़ा उमड़ना चाहते हैं इनको उमड़ने दो

तेरी आँखों की नमी
और नम होना चाहती है इसे नम होने दो

तेरे नीर भरे नयन
शायद बहना चाहते हैं इनको बहने दो

तेरे उलझते हुए गेसू
थोड़ा उलझना चाहते हैं इनको उलझने दो

तेरे काँपते हुए होंठ
कुछ कहना चाहते हैं इनको कहने दो

तेरे दिल के अरमान
थोड़ा उड़ना चाहते हैं इनको उड़ने दो

तेरी अंदर का जज्बा
थोड़ा बहना चाहता है इसे बहने दो

तेरा मन की तड़फ
तोहमत लगाना चाहती है इसको लगाने दो

मत रोको अपने किसी भी अदब को
हर अदब को आज मेरे पास आने दो
गले लगना चाहता हर एक अदब तेरा
यही प्यार है उनको गले लग जाने दो

थोड़ा खुद से प्यार करो मुस्कराने दो
थोड़ा खुद पे ऐतबार करो इतराने दो
थोड़ा खुद को स्वीकार करो जाने दो
जिंदगी स्वयं आ जाएगी उसे आने दो
…………………………… उसे आने दो

Poet: Amrit Pal Singh Gogia 'Pali'

A-082. तेरी खामोश निगाहें
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