A-091. नन्ही सी रौशनी Poem by Amrit Pal Singh Gogia

A-091. नन्ही सी रौशनी

A-091. नन्ही सी रौशनी 9.7.15

झरोखे से आती वो नन्ही सी रौशनी
एक कहानी सुना रही है

कोई जगा हुआ है कुछ तो हुआ है
कोई तो छुआ है यह कैसा धुआं है

जो हर घर से निकला हर घर में जा रहा है
और किस्से सुना रहा है

कोई प्रलोभन दे रहा है कोई लोरी सुना रहा है
कोई प्रलाप कर रहा है कोई गीत गा रहाहै

कोई हिल रहा है कोई हिला रहा है
कोई रो रहा है कोई मुस्करा रहा है
बात जो भी हो मजा बहुत आ रहा है

नई नवेली दुल्हन का घूँघट अभी उठा है
चिलमन के पीछे कोई बेनकाब हुआ है

बालों का टिक्का बिस्तर पे जा गिरा है
झुमका भी देखो कैसे बालों में अड़ा है

दूल्हे को भी मौका बराबर का मिला है
छुड़ाने के बहाने खुद हुआ वो फ़िदा है

आइने में अब दो दिल मिल रहे हैं
एक दूसरे को बाँहों में सिल रहे हैं

यह कैसा प्रलोभन है यह किसका यौवन है
मंद मंद रौशनी में हरकत सी आ रही है

यह मीठी मीठी सिसकियाँ मन को लुभा रही है
कोई तो उठा है जो यह खड़का हुआ है

उठ कर देखो जी जरा
यह कौन आ रहा है जो हमको सता रहा है

बिल्ली की म्याऊं ने सब कुछ बता दिया
निश्चिन्त हो कर सब कुछ हटा दिया

न कोई फासला न कोई दूरी सब कुछ मिटा दिया

लगता है वो एक पुट हो गए हैं
लगता है वो फिर से जुट गए हैं

यौवन लगता फिर से मुस्करा रहा है
एक बार फिर कोई गीत गा रहा है

झरोखे से आती वो नन्ही सी रौशनी
एक कहानी सुना रही है

यह कैसी आवाज़ है कसक कसक रोने की
जैसे कोई बच्चा जिद कर रहा नहीं सोने की

माँ ज़िद पे अड़ी हो उसको सुला लूँ
थोड़ी सी अपनी थकावट को भुला लूँ

लगता है वो माँ के आँचल में जा छिपा है
यह भी बना एक लुक़म छुपी का सिलसिला है

कभी आवाज दब जाती है दबकर
कभी उभर आती है चीख बनकर
माँ की खीज भी सुनायी देने लगी है

सो जा.……वरना एक दूँगी रखकर
सुबह से मुझ को परेशान कर रखा है

तेरे बाप ने क्या नौकरानी समझ रखा है
बाप को बोल अपने
कर ले इंतज़ाम कोई
वरना मायके चली जाऊँगी
न करे परेशान कोई

झरोखे से आती वो नन्ही सी रौशनी
एक कहानी सुना रही है

दूर झरोखे से एक मधुर सी आवाज़ आई
लगता है कोई देवी खुश होकर मुस्कराई

श्रद्धा के सुमन फूल भी खुश हैं
दर्शन देवी के भगवान तुल्य हैं

साज संगीत सुगम मेला है
हर साज़ बजे जैसे वो अकेला है

सितार की तार तन्मय हो रही है
सारंगी अपना आपा खो रही है

तबला थप थाप बजने लगा है
हारमोनियम का संगीत थमने लगा है

जल तरंग जलछवि बनाये हुए है
गिटार गुटरगूं गाने लगा है

सरगम का मौसम छाने लगा है
ये मधुर संगीत मधुर ही गायकी

समां बँधने लगा है कोई गुनगुनाने लगा है
प्यारा सा गीत कोई गाने लगा है

प्रभु के मिलन की सुन्दर ये बेला है
तुम भी भज लो मौजों का मेला है

Poet; Amrit Pal Singh Gogia 'Pali'

Friday, April 8, 2016
Topic(s) of this poem: romantic
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