A-093. बचपन की कहानी Poem by Amrit Pal Singh Gogia

A-093. बचपन की कहानी

बचपन की कहानी 15.6.16—5.38 AM

बचपन की कहानी कितनी हैं लुभानी
कितनी भी पुरानी पर होती हैं सुहानी

कभी दादी तो कभी नानी की जुबानी
लालची बन्दर या बिल्ली की कहानी
खटिया बिछाये बीच आँगन में कहते
कितनी भी गर्मी या पंखे झूलते रहते

दूर बाहर कहीं पोखरे में जाकर नहाना
ढूंड लेते थे हम भी कोई न कोई बहाना

बेरी चढ़ के जब हमने बेरी को हिलाना
बेरी की बरसात देख मजा बहुत आना
दूसरों के अमरुद तोड़ घर के ले आना
पके भी निकलने कुछ कच्चे ही खाना

बस्ते टाँगे हुए स्कूल को पैदल ही जाना
पत्थरों को मारते हुए पत्तों को भी उड़ाना
धूल मिटटी से कपड़े भी कितने सने होने
मम्मी की पिटाई का डर बाल खड़े होने

गणतंत्र दिवस पर वो स्त्री किये हुए कपड़े
लाइन में लग जाओ एक दूसरे को जकड़े
जन गण मन और जय हिन्द के गूंजते नारे
दुश्मन को दिखा देते थे हम दिन में भी तारे

कहाँ गया वो जोश उमंग हम जिंदगी से हारे
क्यों बैठे हैं आज हम उसी जिंदगी के किनारे
धरा प्रवाह बने बैठे थे कभी जिंदगी के खेवैया
जिंदगी आज भी वही है उठ कर देखो तो भैया

हर उम्र के अपने तरीके अपना ही तकाजा हैं
सफ़ेद बालों का रुतबा बना वही तो राजा है
कबूल कर देखो जिंदगी के हर एक रंग को
न कोई झगड़ा रहे 'पाली' उमंग ही उमंग हो
………………………………उमंग ही उमंग हो

Poet: Amrit Pal Singh Go.gia 'Pali'

A-093. बचपन की कहानी
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