माँ की कोख 1.7.16—5.36 AM
मैं एक साधारण इन्सान हूँ
माँ की कोख से पैदा हुआ हूँ
अभी अभी दुनिया का हुआ हूँ
अभी मेरी कोई पहचान नहीं है
पर यहाँ कोई परेशान नहीं है
माहौल देखकर मैं थोड़ा हैरान हूँ
पीछे पड़े हैं जैसे मैं कोई विद्वान हूँ
एक आता है तो दूसरा जाता है
कोई उठाता है कोई घुमाता है
चूमता चाटता मुझको नचाता है
तो कोई पुचकारता ही जाता है
कोई लोरी सुना सुना सुलाता है
कोई पैरों मैं चुटकी दे उठाता है
जिसके भी मन में जो आता है
वही करता है जो उसको भाता है
कौन किसको क्या बताता है
मुझे कुछ समझ नहीं आता है
रोना और चिल्लाना भी आता है
माँ को सताना भी बखूब भाता है
भूख लगे तो चिल्लाना भी आता है
सारे खानदान को भगाना आता है
अपनी बात को मनवाना आता है
आसमाँ को सर पे उठाना आता है
अपनों में प्यार जगाना आता है
दूसरों को अपना बनाना आता है
पूरी अपनी मर्जी करता हूँ
किसी से भी नहीं डरता हूँ
हर बात को मैं समझता हूँ
सबको टिका के रखता हूँ
मालिश भी खूब करवाता हूँ
नानी की याद भी दिलाता हूँ
अपनी मौज मस्ती में रहता हूँ
रोब किसी का नहीं सहता हूँ
दिल करे तो खुश हो जाता हूँ
दिल करे तभी मैं मुस्कराता हूँ
क्यूँ कि …………………….!
मैं एक साधारण इन्सान हूँ
माँ की कोख से पैदा हुआ हूँ
अभी अभी दुनिया का हुआ हूँ
अभी अभी दुनिया का हुआ हूँ
Poet: Amrit Pal Singh Gogia 'Pali'
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