A-113 सुबह की पौ Poem by Amrit Pal Singh Gogia

A-113 सुबह की पौ

A-113 सुबह की पौ15.6.155: 37 AM

सुबह की पौ भी फटने लगी है
रोशनी भी अब बिखरने लगी है
हरियाली थोड़ी निखरने लगी है
फिजा भी थोड़ी बहकने लगी है

चहल कदमी अब बढ़ने लगी है
चिड़ियाँ भी अब चहकने लगी हैं
रात की चादर सिमटने लगी है
धूप भी खुलकर निखरने लगी है

किरण भी छँट छँट आने लगी है
फ़िज़ा भी अब मुस्कुराने लगी है
पंछियों की सरगम भाने लगी है
कोयल भी सुरीला गाने लगी है

ठंडी हवा के झोके आने लगे हैं
हर बदन को छूकर जाने लगे हैं
हवा के हिलोरे बल खाने लगे हैं
कुछ हँसी चेहरे मुस्कराने लगे हैं

Poet: Amrit Pal Singh Gogia "Pali"

A-113 सुबह की पौ
COMMENTS OF THE POEM
Debendra Majhi 20 January 2018

beaming of smiling faces is bound to happen when such Phiza prevails upon earth...

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